दैनिक मरुधर विशेष टीम की बड़ी इन्वेस्टिगेशन

जाजोर स्कूल विवाद : झूठे आरोप, भड़काऊ संदेश और चुप प्रशासन, मेडल प्रमाण- पत्र लौटाने का झूठ, जातिगत भेदभाव की साजिश बेनकाब…

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जाजोर स्कूल विवाद : झूठे आरोप, भड़काऊ संदेश और चुप प्रशासन, मेडल प्रमाण- पत्र लौटाने का झूठ, जातिगत भेदभाव की साजिश बेनकाब…

दो वरिष्ठ महिला अध्यापिकाओं ने कहा—हमारी छवि धूमिल करने की रची गई साजिश

पीटीआई और संस्था प्रधान की भूमिका पर उठते सवाल..??

किसकी साजिश का शिकार बनीं दो वरिष्ठ महिला अध्यापिकाएं…?

झूठे आरोप डेढ़ साल से मानसिक तनाव झेल रहीं महिला शिक्षिकाएं, अब प्रशासन से न्याय की लगा रही है गुहार

मोहम्मद शकील/विजय सिंह

खैरथल 7 जनवरी। राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय जाजोर की छात्रा निकिता द्वारा मेडल लौटाने और दो महिला शिक्षिकाओं पर जातिगत भेदभाव के लगाए गए आरोप अब सवालों के घेरे में आ गए हैं। खैरथल–तिजारा के अतिरिक्त जिला कलेक्टर शिव पाल जाट को सौंपे गए ज्ञापन के बाद जब दैनिक मरुधर विशेष समाचार पत्र के खोजी पत्रकार मोहम्मद शकील और विजय सिंह ने जब मामले की गहन जांच-पड़ताल (इन्वेस्टिगेशन) की, तो झूठे आरोपों की परतें खुलती चली गईं। हमारी पड़ताल (इन्वेस्टिगेशन) में सामने आया कि जिस प्रतिष्ठित समाचार पत्र ने “11 माह बाद पदक लौटाने और जातिगत भेदभाव आरोप” की खबर को सुर्खी बनाया, इस संबंध में एडीएम कार्यालय को न तो कोई मेडल और न ही कोई प्रमाण पत्र सौंपा गया। स्वयं अतिरिक्त जिला कलेक्टर शिव पाल जाट ने स्पष्ट किया कि उन्हें केवल ज्ञापन दिया गया है, मेडल लौटाने की कोई जानकारी उनके पास नहीं है। वहीं जाजोर विद्यालय की पूर्व अध्यापिका प्रियंका के बयानों से भी यह तथ्य सामने आया कि वर्ष 2024 में इस विवाद का विद्यालय स्तर पर राजीनामा हो चुका था, शिक्षिकाएं अवकाश पर थीं और जातिगत भेदभाव जैसा कोई मामला नहीं था। ऐसे में अब यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या पूरे प्रकरण को गलत तथ्यों के आधार पर तूल दिया गया और क्या सच्चाई से अलग एक अलग कहानी गढ़ी गई। हमारी खबर का उद्देश्य संस्थान, बालिका सहित अध्यापक या अध्यापिका की छवि को धूमिल करना नहीं है। हमारा उद्देश्य केवल मामले की गहराई तक जाकर तथ्यों के आधार पर सच्चाई को सामने लाना है, ताकि शासन – प्रशासन तक सही और निष्पक्ष जानकारी पहुँच सके।

अवकाश पर रहते हुए भी आदेश, फिर जातिगत भेदभाव का आरोप—वरिष्ठ अध्यापिका का तीखा सवाल

इस पूरे मामले पर जब जाजोर विद्यालय की वरिष्ठ अध्यापिका सुदेश जैन से बात की गई तो उन्होंने बेहद तीखे शब्दों में अपने ऊपर लगाए गए जातिगत भेदभाव के आरोपों को साजिश करार दिया। उन्होंने साफ कहा कि वे 12 से 17 सितम्बर 2024 तक अवकाश पर थीं, इसके बावजूद 15 सितम्बर 2024 को शाम करीब 5 बजे संस्था प्रधान हरिराम जाटव ने उन्हें व्हाट्सएप के माध्यम से आदेश भेज दिए। सुदेश जैन ने तुरंत स्पष्ट कर दिया था कि वे जोधपुर में हैं और अवकाश के कारण विद्यालय आने में असमर्थ हैं। इसके बाद भी उनके नाम को इस मामले में घसीटना न केवल अनुचित है बल्कि दुर्भावनापूर्ण भी है। उन्होंने बताया कि पहले संतोष कुमारी को आदेश दिए गए थे, लेकिन उनकी अचानक रात को तबीयत खराब होने के कारण उन्होंने अवकाश ले लिया, इसके बावजूद संस्था प्रधान ने यह जानने के बाद भी कि सुदेश जैन पहले से छुट्टी पर हैं, उन्हीं को आदेश थमा दिए। सुदेश जैन ने सवाल उठाया कि जब वे और संतोष कुमारी दोनों अवकाश पर थीं, तो विद्यालय में कार्यरत आठ महिला अध्यापिकाओं में से किसी और को आदेश क्यों नहीं दिए गए। उन्होंने यह भी बताया कि प्रियंका नाम की एक अध्यापिका ने स्वयं बच्ची के साथ जाने की इच्छा जताई थी, फिर भी संस्था प्रधान ने जानबूझकर उसे नजरअंदाज किया। उन्होंने दो टूक कहा कि जब वे अवकाश पर थीं तो उन पर जातिगत भेदभाव का आरोप कैसे लगाया जा सकता है। यह आरोप पूरी तरह झूठा, मनगढ़ंत और तथ्यहीन है। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि वर्ष 2024 में श्री चन्द के साथ विद्यालय स्तर पर राजीनामा हो चुका है, जिस पर सभी अध्यापक- अध्यापिकाओं के हस्ताक्षर हैं और वह दस्तावेज संस्था प्रधान के पास है, इसके बावजूद 2025 में इस मामले को फिर से उछालना कई सवाल खड़े करता है। वरिष्ठ अध्यापिका ने कहा कि वे पिछले डेढ़ साल से लगातार मानसिक तनाव झेल रही हैं और अब प्रशासन से न्याय की उम्मीद लगाए बैठी हैं। उन्होंने तीखे लहजे में कहा कि जब वे अवकाश पर थीं, तो जातिगत भेदभाव का मामला पैदा ही कैसे हो गया। उन्हें संदेह है कि संस्था प्रधान हरिराम जाटव की मंशा शुरू से ही संदिग्ध रही है, क्योंकि अवकाश की पूरी जानकारी होने के बावजूद आदेश सिर्फ उन्हें ही भेजे गए, और बाद में उन्हीं पर गंभीर आरोप मढ़ दिए गए।

स्वास्थ्य खराब होने पर भी लगा दिया आरोप—संतोष कुमारी

इस मामले में जब वरिष्ठ अध्यापिका संतोष कुमारी से बातचीत की गई तो उन्होंने अपने ऊपर लगाए गए जातिगत भेदभाव के आरोपों को सिरे से खारिज किया। उन्होंने साफ कहा कि रात को उनकी अचानक तबीयत बिगड़ गई थी, उन्होंने समय पर अपना मेडिकल,सिकनेस, फिटनेस चिकित्सकीय परामर्श पर्ची और प्रार्थना पत्र व्हाट्सएप के माध्यम से संस्था प्रधान हरिराम जाटव को भेज दिया था। इसके बाद उनकी जगह दूसरी वरिष्ठ अध्यापिका सुदेश जैन की ड्यूटी लगाई गई, जबकि सुदेश जैन पहले से ही अवकाश पर थीं। संतोष कुमारी ने सवाल उठाया कि जब विद्यालय में आठ अन्य महिला अध्यापिकाएं मौजूद थीं, तो फिर उन्हीं दोनों को निशाना क्यों बनाया गया..?? उन्होंने दो टूक कहा कि उनके खिलाफ लगाए जा रहे सभी आरोप झूठे, मनगढ़ंत और दुर्भावनापूर्ण हैं। विवाद की जड़ पर बोलते हुए संतोष कुमारी ने बताया कि मेरी अचानक रात को तबीयत खराब होने के कारण नहीं जा सकीं, तभी पीटीआई वीर सिंह पूनिया ने ऑफिशियल जीएसएस जाजोर व्हाट्सएप ग्रुप में संदेश डाल दिया कि “तुम लोग छुआछूत करते हो, इसी कारण बच्ची के साथ नहीं गए और उसे स्कॉलरशिप नहीं मिल पा रही है।” यहीं से पूरा मामला भड़काया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि संस्था प्रधान हरिराम जाटव यदि चाहते तो किसी अन्य महिला अध्यापिका को भेज सकते थे, लेकिन ऐसा न कर एक साजिश के तहत उन्हें और सुदेश जैन को फंसाया गया। संतोष कुमारी ने कहा कि अपने 34 वर्षों के सेवाकाल में वे कई बार क्रीड़ा प्रतियोगिताओं में जा चुकी हैं और उन पर इस तरह का आरोप लगना उनकी छवि धूमिल करने की साजिश है। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि वर्ष 2024 में श्री चंद और ग्राम के कुछ लोगों द्वारा विद्यालय की तालाबंदी के बाद एक समझौता हुआ था, जिस पर पूरे स्कूल स्टाफ के हस्ताक्षर थे और यह तय किया गया था कि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा नहीं बनेगी। यह समझौता भी संस्था प्रधान हरिराम जाटव के कार्यकाल में हुआ और वही दस्तावेज आज भी उनके पास मौजूद है, इसके बावजूद 2025 में इस मामले को फिर से उछालना साफ तौर पर द्वेषपूर्ण कार्रवाई को दर्शाता है। संतोष कुमारी ने प्रशासन से निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए कहा कि वे पिछले डेढ़ साल से लगातार मानसिक तनाव में हैं। उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि इस झूठे मामले ने उन्हें बेवजह फंसाया जा रहा है और कभी-कभी अत्यंत नकारात्मक विचार भी मन में आते हैं। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि पूरे विवाद को भड़काने में पीटीआई वीर सिंह पूनिया के व्हाट्सएप संदेश और संस्था प्रधान हरिराम जाटव की भूमिका संदिग्ध रही है। उन्होंने यह भी बताया कि उन्होंने सरपंच को मौखिक
शिकायत की और अपनी मानसिक स्थिति से अवगत कराया है। उनके पति हार्ट पेशेंट हैं, परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर है, और इसके बावजूद उन्हें बेवजह इस झूठे मामले में घसीटा जा रहा है। उनका कहना है कि बच्ची विद्यालय से टीसी लेकर जा चुकी है, फिर भी बार-बार शिकायतें कराकर स्कूल के ही कुछ लोग अभिभावक को भड़का रहे हैं, जो पूरे मामले को और भी गंभीर बना रहा है।

असली जड़ कौन है—साजिश या संयोग..??

इस पूरे विवाद को गौर से देखा जाए तो सवाल साफ तौर पर यही उठता है कि आखिर इसकी असली जड़ कौन है। तथ्य बताते हैं कि जब एक अध्यापिका अचानक स्वास्थ्य खराब होने के कारण और दूसरी पहले से अवकाश पर थी, तब भी जानबूझकर उन्हीं दोनों के नाम आदेश जारी किए गए, जबकि विद्यालय में आठ अन्य महिला अध्यापिकाएं मौजूद थीं। यहीं से संदेह गहराता है। इसके बाद ऑफिशियल व्हाट्सएप ग्रुप में “छुआछूत” जैसे गंभीर और भड़काऊ आरोप उछाले गए, जिसने मामले को आग में घी डालने का काम किया। हालात को संभालने की बजाय उन्हें और उलझाया गया, पुराने समझौते को नजरअंदाज किया गया और 2024 में सुलझ चुके मामले को 2025 में फिर से जिंदा कर दिया गया। साफ दिखता है कि यह विवाद किसी एक घटना का नतीजा नहीं, बल्कि कुछ लोगों की दुर्भावनापूर्ण सोच, आपसी द्वेष और जानबूझकर फैलाए गए आरोपों की उपज है। सवाल अब आरोपित अध्यापिकाओं पर नहीं, बल्कि उन लोगों पर उठता है जिन्होंने हालात पैदा किए और इस पूरे मामले को साजिशन भड़काया।

पीटीआई का भड़काऊ व्हाट्सएप संदेश बना पूरे विवाद की जड़, वीर सिंह की गैर-जिम्मेदारी उजागर

इस पूरे विवाद की चिंगारी पीटीआई वीर सिंह पूनिया के एक भड़काऊ और गैर-जिम्मेदाराना व्हाट्सएप संदेश से लगी, जिसने पूरे विद्यालय का माहौल ज़हरीला कर दिया। ऑफिशियल जीएसएस जाजोर ग्रुप में डाले गए इस संदेश में उन्होंने बिना किसी जांच, प्रमाण या सक्षम अधिकार के पूरे स्टाफ पर खुलेआम “छुआछूत” जैसे संगीन आरोप मढ़ दिए। छात्रवृत्ति न मिलने को भी सीधे तौर पर जातिगत भेदभाव से जोड़ दिया गया, जबकि इसकी प्रशासनिक प्रक्रिया और कारणों की कोई पड़ताल तक नहीं की गई। संदेश की भाषा न केवल आरोपात्मक थी, बल्कि जानबूझकर भावनाएं भड़काने वाली भी थी, जिससे साफ जाहिर होता है कि पीटीआई वीर सिंह पूनिया के द्वारा किया गया व्हाट्सएप ग्रुप पर मैसेज ने आग में घी डालने का काम किया था। पीटीआई वीर सिंह ने छात्रा की उपलब्धियों को आधार बनाकर यह नैरेटिव गढ़ा कि शिक्षक उसकी प्रगति से जलते हैं और जातिगत कारणों से उसके साथ नहीं जाते। यह सीधा-सीधा शिक्षकों की सामाजिक प्रतिष्ठा पर हमला था। इतना ही नहीं, “इसका परिणाम आप लोगों को भुगतना पड़ेगा” जैसी धमकी भरी पंक्तियों ने पूरे स्टाफ को मानसिक दबाव में डाल दिया। एक शिक्षक होकर इस तरह की भाषा और आरोप न सिर्फ अनुशासनहीनता दर्शाते हैं, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की गरिमा को भी ठेस पहुंचाते हैं। हकीकत यह है कि इस एक संदेश ने अफवाहों को जन्म दिया, अभिभावकों को भड़काया और एक प्रशासनिक विषय को सामाजिक टकराव में बदल दिया। बिना तथ्यों के लगाए गए आरोपों ने निर्दोष महिला अध्यापिकाओं को कटघरे में खड़ा कर दिया। इस साफ है कि पीटीआई वीर सिंह पूनिया ने इस विवाद को भड़काने में सबसे बड़ी भूमिका व्हाट्सएप संदेश की रही, जिसने पूरे मामले को गलत दिशा में मोड़ दिया।

विवाद रोकने को आगे आई महिला अध्यापिका, लेकिन पीटीआई की चुप्पी ने भड़का दी आग

पीटीआई वीर सिंह पूनिया के भड़काऊ व्हाट्सएप संदेश के बाद भी यदि किसी ने जिम्मेदारी और संवेदनशीलता दिखाई, तो वह महिला अध्यापिका प्रियंका थीं। अध्यापिका प्रियंका ने पत्रकार को दूरभाष पर बताया कि विवाद बढ़ता देख उन्होंने पीटीआई वीर सिंह पूनिया को व्यक्तिगत व्हाट्सएप मैसेज कर लिखा—“कोई नहीं चल रहा है तो मैं चलती हूं।” उनका उद्देश्य सिर्फ इतना था कि बच्ची के साथ कोई चला जाए और मामला वहीं शांत हो जाए। हैरानी की बात यह है कि पीटीआई वीर सिंह पूनिया ने यह मैसेज देख तो लिया, लेकिन जानबूझकर कोई जवाब नहीं दिया। यह चुप्पी खुद कई सवाल खड़े करती है। प्रियंका ने स्पष्ट किया कि उस समय वरिष्ठ महिला अध्यापिका सुदेश जैन पहले से अवकाश पर थीं और वरिष्ठ महिला अध्यापिका संतोष कुमारी की अचानक रात को तबीयत खराब होने के कारण अवकाश ले लिया था। इसके बावजूद समाधान निकालने की बजाय पीटीआई वीर सिंह पूनिया ने ऑफिशियल जीएसएस जाजोर व्हाट्सएप ग्रुप में “छुआछूत” जैसा भड़काऊ और गंभीर आरोपों से भरा संदेश डाल दिया, जिससे विद्यालय का माहौल पूरी तरह खराब हो गया। प्रियंका ने दो बताया कि वे अपनी स्वयं की इच्छा से बच्ची के साथ जाने को तैयार थीं, लेकिन न तो संस्था प्रधान हरिराम जाटव ने उन्हें कोई आदेश दिया और न ही पीटीआई वीर सिंह पूनिया ने उनसे संपर्क किया।
साफ है कि अगर उस समय प्रियंका की पहल को गंभीरता से लिया जाता, तो न विवाद बढ़ता, न दोनों वरिष्ठ महिला अध्यापिकाओं की छवि पर दाग लगता। लेकिन समाधान को नजरअंदाज कर आरोपों का रास्ता चुना गया, जिससे यह मामला बेवजह तूल पकड़ता चला गया।

पीटीआई का भड़काऊ मैसेज और संस्था प्रधान के मनमाने आदेश—पीटीआई व संस्था प्रधान की जोड़ी ने गढ़ी साजिश

इस पूरे प्रकरण में पीटीआई वीर सिंह पूनिया और संस्था प्रधान हरिराम जाटव की भूमिका सवालों के घेरे में है। पीटीआई द्वारा “छुआछूत” जैसे गंभीर और भड़काऊ शब्दों में डाला गया व्हाट्सएप मैसेज विवाद को हवा देने का काम करता है, वहीं संस्था प्रधान ने हालात को संभालने के बजाय आग में घी डाल दिया। हैरानी की बात यह है कि जिस वरिष्ठ महिला अध्यापिका सुदेश जैन पर आदेश थोपे गए, वह पहले से ही अवकाश पर थी, फिर भी जानबूझकर उसी को निशाना बनाया गया। जबकि संस्था प्रधान हरिराम जाटव ने स्वयं कॉमन आदेश जारी किया था कि कोई भी महिला अध्यापिका बच्ची के साथ जा सकती है, इसके बावजूद प्रियंका जैसी अध्यापिका—जो अपनी मर्जी से जाने को तैयार थी—उसे सिरे से नजरअंदाज कर दिया गया। इतना ही नहीं, यदि वास्तव में मंशा समाधान की होती तो संस्था प्रधान जिले से किसी भी महिला पीटीआई की व्यवस्था कर सकते थे, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। इससे यह संदेह और गहरा होता है कि यह लापरवाही नहीं, बल्कि सोची-समझी साजिश थी—जिसका मकसद दो वरिष्ठ महिला अध्यापिकाओं सुदेश जैन और संतोष कुमारी को मानसिक रूप से प्रताड़ित करना और उन्हें गलत तरीके से फंसाना था। एक ओर भड़काऊ संदेशों से माहौल विषाक्त किया गया, दूसरी ओर प्रशासनिक फैसलों के नाम पर चुनिंदा लोगों को कठघरे में खड़ा किया गया। यही वजह है कि यह मामला अब महज भूल नहीं, बल्कि सुनियोजित कहानी बनकर सामने आ रहा है।

शिकायतकर्ता के आरोपों में स्पष्ट विरोधाभास

शिकायतकर्ता श्री चन्द, निवासी चिकानी द्वारा 24 सितम्बर 2024 को ब्लॉक शिक्षा अधिकारी किशनगढ़ बास को दी गई लिखित शिकायत में विद्यालय स्टाफ पर केवल लापरवाही और मनमानी के आरोप लगाए गए थे। उस शिकायत में कहीं भी जातिगत भेदभाव या दुर्भावना का उल्लेख नहीं था। इसके विपरीत, लगभग एक वर्ष बाद 27 नवम्बर 2025 को अतिरिक्त जिला कलेक्टर खैरथल–तिजारा को सौंपे गए ज्ञापन में शिकायतकर्ता ने अपने आरोपों का स्वरूप बदलते हुए मेडल व प्रमाण-पत्र लौटाने तथा जातिगत भेदभाव के गंभीर आरोप लगाए। साथ ही, स्वयं को दलित (जाटव) बताते हुए न्याय न मिलने की बात कही गई। स्पष्ट है कि जहाँ 2024 की शिकायत प्रशासनिक लापरवाही तक सीमित थी, वहीं 2025 के ज्ञापन में नए और गंभीर आरोप जोड़े गए, जो पूर्व शिकायत से मेल नहीं खाते। इससे शिकायतकर्ता के बयानों में समय के साथ स्पष्ट विरोधाभास दिखाई देता है, जिससे शिकायत की सत्यता और मंशा पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

उठते हुए अहम सवाल

अध्यापिका प्रियंका के बताएं अनुसार इस पूरे मामले में कई गंभीर सवाल खड़े होते हैं। यदि वर्ष 2024 में इस विवाद का विद्यालय स्तर पर लिखित राजीनामा हो चुका था, तो फिर 2025 में उसी मामले को दोबारा उठाने की आवश्यकता क्यों पड़ी। जब अध्यापिका सुदेश जैन पहले से अवकाश पर थीं और अध्यापिका संतोष कुमारी ने अचानक बीमारी के कारण अवकाश लिया था, तो इसे जानबूझकर की गई लापरवाही या जातिगत भेदभाव कैसे माना जा सकता है। यदि अध्यापिका प्रियंका स्वयं छात्रा के साथ जाने को तैयार थीं और उन्होंने पीटीआई को इसकी सूचना भी दी थी, तो फिर उस प्रस्ताव पर कोई निर्णय क्यों नहीं लिया गया। इसके अलावा, जब विद्यालय में छात्रा सभी अध्यापिकाओं के साथ भोजन करती थी और किसी प्रकार की छुआछूत का व्यवहार नहीं था, तो अचानक जातिगत भेदभाव के आरोप किस आधार पर लगाए गए। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रशासनिक लापरवाही के एक मामले को समय के साथ बढ़ा-चढ़ाकर सामाजिक और जातिगत विवाद का रूप दिया जा रहा है, और क्या इससे वास्तविक तथ्यों से ध्यान हटाने का प्रयास तो नहीं किया जा रहा है।

जांच या खानापूर्ति..? जांच करने वाले प्रिंसिपल के जवाबों ने खोली पोल

इस पूरे मामले में जब प्रिंसिपल भेजड़ा कोमल कांत से दूरभाष पर बातचीत की गई तो उनके जवाब खुद ही कई सवाल खड़े करते नजर आए। उन्होंने कहा कि छात्रा निकिता के मामले की जांच उन्होंने डीईओ के आदेश पर काफी पहले कर ली थी और रिपोर्ट उसी वक्त डीईओ राजकुमार जैन को सौंप दी गई थी, लेकिन जांच के नतीजों पर बोलने से यह कहते हुए पल्ला झाड़ लिया कि जांच गोपनीय होती है। वहीं जाजोर की दो महिला अध्यापिकाओं पर लगे जातिगत भेदभाव के गंभीर आरोपों पर पहले तो उन्होंने कहा कि उन्हें कुछ याद ही नहीं है, और फिर यह भी जोड़ दिया कि वे इस बारे में कुछ बता ही नहीं सकते। दैनिक मरुधर विशेष समाचार पत्र के खोजी रिपोर्टर द्वारा बार-बार सवाल पूछे जाने पर उनका जवाब और भी चौंकाने वाला रहा — उन्होंने दावा किया कि उनके पास जातिगत भेदभाव से जुड़ा कोई मामला था ही नहीं और यह कहते हुए बात टाल दी कि वे ऐसी बातें याद नहीं रखते। हालांकि, अंत में उन्होंने इतना जरूर माना कि उन्हें सिर्फ “निकिता का मामला” याद है, जिससे जांच की गंभीरता और पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो गए हैं।

इनका कहना है

संस्था प्रधान हरिराम जाटव से जब ऑन कैमरा बातचीत की गई तो उन्होंने बताया कि वरिष्ठ महिला अध्यापिका संतोष कुमारी को बालिका के साथ भेजने के आदेश दिए गए थे, लेकिन उनकी अचानक तबीयत खराब हो गई। इसके संबंध में 15 सितंबर 2024 को मेडिकल, सिकनेस और फिटनेस से जुड़े प्रार्थना पत्र की सूचना उन्हें सुबह करीब 11 बजे व्हाट्सएप के माध्यम से दी गई थी। जाटव का कहना है कि इसकी जानकारी उन्होंने तत्काल डीईओ राजकुमार जैन और सीबीईओ शकुंलता मीणा को दे दी थी। उनके अनुसार, अधिकारियों ने निर्देश दिए कि किसी अन्य महिला अध्यापिका को बालिका के साथ भेजा जाए। इसके बाद उन्होंने वरिष्ठ महिला अध्यापिका सुदेश जैन को व्हाट्सएप पर आदेश जारी किया, लेकिन न तो कोई जवाब मिला और न ही उनका फोन उठाया गया। यहां बड़ा सवाल तब खड़ा हुआ जब यह सामने आया कि 15 सितंबर 2024 को विद्यालय का अवकाश था। इस पर जाटव ने स्वीकार किया कि अवकाश था, लेकिन बालिका को उसी दिन शाम को ब्यावर से अजमेर जाना था। जब उनसे पूछा गया कि सुदेश जैन पहले से ही अवकाश पर थीं, फिर भी उनके नाम आदेश क्यों जारी किए गए, तो उनका जवाब था कि सीडीओ अलवर के आदेशानुसार जिला प्रतियोगिता समाप्त होने तक किसी भी कार्मिक का अवकाश स्वीकृत नहीं किया जाना था। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने डीईओ के आदेश पर ही कार्य किया। संस्था प्रधान हरिराम जाटव ने यह भी माना कि उनके द्वारा एक कॉमन आदेश जारी किया गया था, जिसमें लिखा था कि कोई भी महिला अध्यापिका अपनी स्वेच्छा से बालिका के साथ जाना चाहे तो जा सकती है। लेकिन जब उनसे पूछा गया कि महिला अध्यापिका प्रियंका स्वेच्छा से जाने को तैयार थीं, तो उन्हें क्यों नहीं भेजा गया, इस सवाल पर उन्होंने कोई जवाब देना उचित नहीं समझा। मामला यहीं नहीं रुका। पीटीआई वीर सिंह पुनिया द्वारा ऑफिशियल जीएसएस जाजोर व्हाट्सएप ग्रुप में छुआछूत और बालिका की छात्रवृत्ति न मिलने को लेकर भड़काऊ मैसेज डालने के सवाल पर जाटव ने गैर-जिम्मेदाराना रवैया अपनाते हुए कहा कि उन्होंने ऐसा कोई मैसेज नहीं देखा और न ही उन्हें इसकी जानकारी है। जब पूछा गया कि विद्यालय में अन्य महिला अध्यापिकाएं मौजूद थीं, तो उन्हें बालिका के साथ क्यों नहीं भेजा गया, इस पर भी वे कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सके। सबसे चौंकाने वाला बयान तब सामने आया जब संस्था प्रधान ने ऑन कैमरा स्वीकार किया कि विद्यालय में कुल 11 महिला अध्यापिकाएं कार्यरत थीं, लेकिन उनके अनुसार कोई भी बालिका के साथ जाने को तैयार नहीं हुई। उन्होंने दावा किया कि इस संबंध में शिकायत जिला कलेक्टर को भेजी जा चुकी है। बालिका की छात्रवृत्ति को लेकर पूछे गए सवालों पर भी संस्था प्रधान ने स्पष्ट जवाब देने से बचते हुए कहा कि उनके पास इस संबंध में कोई शिकायत नहीं आई है। पीटीआई वीर सिंह पूनिया द्वारा किया गया छुआछूत और छात्रवृत्ति से जुड़े व्हाट्सएप मैसेज को लेकर उन्होंने कहा कि संभव है किसी ने आक्रोश में आकर मैसेज लिख दिया हो, क्योंकि स्कूल में उस समय तनावपूर्ण माहौल बना हुआ था। जब उनसे पूछा गया कि इस मामले में उन्होंने क्या कार्रवाई की, तो उन्होंने फिर कहा मेरी जानकारी में नहीं है। संस्था प्रधान ने यह भी स्वीकार किया कि ऑफिशियल जीएसएस जाजोर व्हाट्सएप ग्रुप उन्हीं के द्वारा बनाया गया है, लेकिन उसी ग्रुप में डाले गए गंभीर आरोपों की जानकारी से वे अनभिज्ञ बने रहे। महिला अध्यापिका प्रियंका का यह भी कहना है कि इस पूरे मामले का निपटारा 2024 में ही हो चुका था और विद्यालय में कार्यरत अध्यापक अध्यापकों ने राजीनामे पर हस्ताक्षर भी किए थे। इस सवाल पर भी संस्था प्रधान ने चुप्पी साध ली। सबसे बड़ा सवाल जब 11 महिला शिक्षिकाएं विद्यालय में कार्यरत थीं, तो बालिका के साथ संस्था प्रधान हरिराम जाटव ने अन्य महिला अध्यापिकाएं क्यों नहीं भेजी..? अवकाश पर चल रही दो शिक्षिकाओं पर ही दबाव क्यों बनाया गया..? स्वेच्छा से जाने को तैयार प्रियंका महिला शिक्षिका को क्यों रोका गया..? पीटीआई द्वारा छात्रवृत्ति और छुआछूत जैसे गंभीर आरोपों पर आज तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई…? सबसे बड़ा सवाल क्या संस्था प्रधान हरिराम जाटव को केवल आदेश जारी करना आता है, या फिर जिम्मेदारी और जवाबदेही का मतलब ही नहीं पता..? यह मामला अब केवल एक बालिका का नहीं, बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था की संवेदनशीलता और प्रशासन की जवाबदेही की परीक्षा बन चुका है।

हरि राम जाटव संस्था प्रधान जाजोर

पीटीआई वीर सिंह पुनिया से ऑन-कैमरा बातचीत के सवाल-जवाब कुछ इस तरह रहे

सवाल: आपने कहा था कि बालिका के साथ कोई महिला अध्यापिका नहीं जा रही थी। इसका क्या मतलब है..?

वीर सिंह पुनिया: दरअसल, मैंने अपने विद्यालय की महिला अध्यापिकाओं से पूछा। उन्होंने प्रियंका नाम की अध्यापिका का नाम लिया और कहा कि ‘सर, मैं कोटकासिम हूं और मैं नहीं जा सकती।’

सवाल: प्रियंका मैडम ने कोई व्यक्तिगत संदेश भेजा था क्या..?
वीर सिंह पुनिया: हां, उन्होंने पर्सनल व्हाट्सएप मैसेज में कहा था कि मैं अपनी इच्छा से बालिका के साथ जाने को तैयार हूं ताकि जीएसएस जाजोर व्हाट्सएप ग्रुप में चल रहे विवाद को खत्म किया जा सके। अगर कोई महिला अध्यापिका नहीं जा रही, तो मैं स्वयं तैयार हूं।

सवाल: तो आपने क्या किया..?
वीर सिंह पुनिया: मैंने करीब 3 बजे प्रियंका मैडम को फोन किया, लेकिन उन्होंने मना कर दिया और कहा कि मैं गांव गई हुई हूं। इसके बाद मैंने अपने वरिष्ठ अधिकारी को जानकारी दी। अंततः बालिका के साथ मैं और बालिका की भाभी गए।

सवाल: संस्था प्रधान हरिराम जाटव के द्वारा कॉमन आदेश निकाले गए इसका क्या असर पड़ा..?
वीर सिंह पुनिया: संस्था प्रधान ने कॉमन आदेश जारी किए थे, लेकिन कोई भी महिला अध्यापिका जाने को तैयार नहीं हुई।

सवाल: बालिका की पढ़ाई और छात्रवृत्ति की स्थिति क्या है..?
वीर सिंह पुनिया: मैंने ही बालिका को निजी शिक्षण संस्थान से लेकर आया और सरकारी स्कूल में उसका एडमिशन कराया था। लेकिन आज तक उसे छात्रवृत्ति नहीं मिली।

सवाल: आपने जीएसएस जाजोर व्हाट्सएप ग्रुप पर छुआछूत और बालिका की स्कॉलरशिप को लेकर भड़काऊ मैसेज डाले थे..?
वीर सिंह पुनिया: हां, मैंने वह मैसेज डाले थे।

सवालों से भागती डीईओ—न्याय से बचाव या सच्चाई पर पर्दा..?

इस मामले में जब खैरथल–तिजारा जिले की डीईओ शकुंतला मीणा से दैनिक मरुधर विशेष समाचार पत्र के खोजी पत्रकारों ने मामले की जानकारी लेनी चाही तो, डीईओ शकुंतला मीणा का रवैया हैरान करने वाला वाला रहा। पत्रकारों को जानकारी देने के बजाय उन्होंने धमकी भरे अंदाज में कह दिया—“मैं किसी भी मामले में कोई जानकारी नहीं दूंगी,” और यह कहते हुए अपने ही कार्यालय से निकलकर दूसरे कमरे में जा छिपीं। एक जिम्मेदार अधिकारी का इस तरह सवालों से भागना प्रशासनिक गरिमा नहीं, बल्कि जवाबदेही से खुला पलायन है। अब सवाल सीधा और तीखा है—क्या डीईओ शकुंतला मीणा अपनी जिम्मेदारी नहीं समझतीं, या फिर इस मामले में कुछ ऐसा है जिसे सामने आने से रोका जा रहा है। अगर जांच निष्पक्ष हुई होती, तो सवालों से डर क्यों। चुप्पी, टालमटोल और आक्रामक रवैया इस आशंका को मजबूत करता है कि कहीं न कहीं सच्चाई दबाई जा रही है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि दो वरिष्ठ महिला अध्यापिकाओं पर लगाए गए झूठे जातिगत भेदभाव के आरोपों से उन्हें न्याय कैसे मिलेगा। जब जांच की कमान संभालने वाले अधिकारी ही कटघरे में खड़े नजर आएं, तो न्याय की उम्मीद करना क्या बेमानी नहीं हो जाता..? अब यह मामला केवल शिक्षकों का नहीं, बल्कि पूरे प्रशासन की विश्वसनीयता का बन चुका है।