कोटपूतली ।

कुछ कहानियाँ शोर नहीं मचातीं, वे चुपचाप आकार लेती हैं। कोटपुतली, राजस्थान के समीर ऐसी ही एक कहानी हैं। संगीत संस्था जयपुर से विधिवत प्रशिक्षण ले रहे समीर के लिए संगीत कोई शौक नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका है। उनके लिए हर दिन, हर पल, हर सांस संगीत से जुड़ी हुई है।
आज का दृश्य साधारण होते हुए भी असाधारण था। एक स्कूल के खुले खेल मैदान में समीर पूरे मनोयोग से अपनी प्रैक्टिस में डूबे हुए थे। न मंच, न लाइट, न श्रोताओं की भीड़—बस खुला आसमान, शांत वातावरण और सुरों की साधना। यह कोई दिखावा नहीं था, यह उस जुनून का प्रतिबिंब था, जो किसी कलाकार को अंदर से संचालित करता है।
तेज धूप हो या सीमित संसाधन, समीर के अभ्यास में कभी बाधा नहीं बनते। उनके चेहरे पर थकान नहीं, बल्कि आत्मसंतोष और दृढ़ संकल्प झलकता है। यही वह पागलपन है, जिसे दुनिया अक्सर समझ नहीं पाती, लेकिन यही पागलपन एक दिन पहचान बनता है।
आज जब अधिकतर युवा त्वरित सफलता की चाह में भटक रहे हैं, समीर धैर्य, अनुशासन और निरंतर अभ्यास के रास्ते पर चल रहे हैं। संगीत संस्था जयपुर से मिली विधिवत शिक्षा और स्वयं की लगन ने उनके सुरों को निखार दिया है। वे मानते हैं कि मंच पर चमकने से पहले मैदान में पसीना बहाना ज़रूरी होता है।
खुले मैदान में गूंजते सुर यह बताते हैं कि सच्ची कला सुविधाओं की मोहताज नहीं होती। कलाकार जहाँ खड़ा होता है, वही जगह मंच बन जाती है। समीर की यह साधना आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणा है—कि सपनों के पीछे दौड़ने के लिए साहस और समर्पण चाहिए, न कि केवल संसाधन।
संभव है आज समीर अकेले अभ्यास कर रहे हों, लेकिन आने वाला समय गवाह बनेगा कि यही एकांत, यही मेहनत और यही पागलपन उन्हें उस मुकाम तक पहुंचाएगा, जहां उनका नाम संगीत के सुरों के साथ पहचाना जाएगा।
समीर की कहानी यही सिखाती है—जब संगीत ही जिंदगी बन जाए, तो जिंदगी खुद एक खूबसूरत राग बन जाती है।

REPORT –SEETARAM GUPTA (KOTPUTLI)





